अवैध निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कहा है कि किसी भी गैरकानूनी निर्माण को यह कहकर संरक्षण नहीं दिया जा सकता कि वह कंपाउंडेबल उल्लंघन की श्रेणी में आता है। अदालत ने अवैध निर्माण पर की जा रही तोड़फोड़ के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून का उल्लंघन कर बनाए गए निर्माण को नियमित करने का दावा अपने आप में वैध नहीं हो जाता। यदि कोई निर्माण नियमों, मास्टर प्लान या भवन उपनियमों के खिलाफ किया गया है, तो संबंधित प्राधिकरण को उसे हटाने या गिराने का पूरा अधिकार है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि कंपाउंडेबल उल्लंघन का मतलब यह नहीं है कि अवैध निर्माण को हमेशा बचाया जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि अवैध निर्माण न केवल कानून व्यवस्था को कमजोर करता है, बल्कि शहरों की योजनाबद्ध विकास प्रक्रिया पर भी गंभीर असर डालता है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में न्यायालय का उद्देश्य कानून का पालन सुनिश्चित करना है, न कि नियमों को तोड़ने वालों को राहत देना। अदालत के इस फैसले को शहरी विकास और अवैध निर्माण के खिलाफ एक अहम संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।







