उत्तर प्रदेश में 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो गई है। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने बड़ा दांव खेलते हुए विधान परिषद में मुस्लिम नेता जासमीन अंसारी को नेता प्रतिपक्ष बनाया है। सपा के इस कदम को सीधे तौर पर प्रदेश के मुस्लिम वोट बैंक को साधे रखने और विपक्षी दलों को राजनीतिक संदेश देने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
MY समीकरण और PDA पर फोकस
अखिलेश यादव लगातार ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा बुलंद कर रहे हैं। जासमीन अंसारी को यह अहम जिम्मेदारी देकर सपा ने अपने परंपरागत ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण को और मजबूत करने का प्रयास किया है, जो ऐतिहासिक रूप से पार्टी का मजबूत वोट बैंक माना जाता है।
143 सीटों पर मुस्लिम वोटरों का असर
उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में से लगभग एक-तिहाई यानी 143 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता चुनाव के नतीजों को तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
इनमें से 70 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 से 30 प्रतिशत के बीच है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह प्रभाव सबसे ज्यादा है, जहां कुल आबादी में लगभग 26.21 फीसदी हिस्सेदारी मुस्लिम समुदाय की है।
ओवैसी के ऑफर पर अखिलेश का रुख और अल्टीमेटम
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की ओर से सपा को गठबंधन का प्रस्ताव दिया गया था, जिसे अखिलेश यादव ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उत्तर प्रदेश में जो गठबंधन पहले से है, वही कायम रहेगा। इसके जवाब में ओवैसी की पार्टी ने सपा को निर्णय पर पुनर्विचार के लिए 2 अक्टूबर तक का समय दिया है।
AIMIM और कांग्रेस का बढ़ता दबाव
AIMIM लगातार सपा पर मुस्लिम नेतृत्व को नजरअंदाज करने का आरोप लगाती रही है। पार्टी प्रवक्ता शादाब चौहान ने सपा पर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की ओर झुकने का दावा किया था, जिसे सपा खारिज करते हुए AIMIM को भाजपा की ‘बी-टीम’ करार देती रही है।
दूसरी ओर, कांग्रेस भी प्रदेश में अपने अल्पसंख्यक विभाग को सक्रिय कर मुस्लिम मतों को फिर से अपने पक्ष में लाने की कोशिश में जुटी है, जिससे सपा पर दोहरा राजनीतिक दबाव बन रहा है। ऐसे में अखिलेश यादव का यह नया कदम बसपा, AIMIM और कांग्रेस तीनों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।








