PM मोदी की फोटो की आड़ में बना डाली 6 मंजिला अवैध बिल्डिंग? सांसद कंवर सिंह तंवर सवालों के घेरे में

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छतरपुर, दक्षिणी दिल्ली का 100 फुटा रोड पर स्थित प्लॉट नंबर D-93 इन दिनों एक बड़े विवाद का केंद्र बना हुआ है, जहाँ अवैध निर्माण, प्रशासनिक निष्क्रियता और राजनीतिक प्रभाव के गंभीर आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। यह मामला नया नहीं है, बल्कि पिछले कई महीनों से चल रहा है और सबसे अहम बात यह है कि पहले शिकायतों और कार्रवाई के बावजूद आज भी निर्माण गतिविधियाँ जारी बताई जा रही हैं और जमीन से शुरू हुआ ये निर्माण का खेल आज 6 मंजिला इमारत का रूप ले चुका है।

इस निर्माण की शिकायत एक शिकायतकर्ता द्वारा 1 सितंबर 2025 को की गई थी उस समय दिल्ली में प्रदूषण अपने चरम पर था और GRAP-3 जैसे सख्त प्रतिबंध लागू थे, जिनके तहत किसी भी प्रकार की गैर-जरूरी निर्माण गतिविधि, खुदाई और भारी मशीनों के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक थी। इसके बावजूद इस साइट पर जेसीबी और अन्य भारी मशीनों के जरिए दिन-रात काम किया गया, जो सीधे तौर पर पर्यावरण नियमों और सरकारी आदेशों की अनदेखी को दर्शाता है। उस समय स्थानीय लोगों ने कई बार शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन निर्माण कार्य पर कोई प्रभावी रोक नहीं लगाई गई।

इसके बाद 11 नवंबर 2025 को भी इस मामले को लेकर शिकायतें और कार्रवाई की बातें सामने आईं, लेकिन स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ। अंततः 11 फरवरी 2026 को प्रशासन ने इस अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करते हुए डिमोलिशन किया था और साइट को सील कर दिया। उस समय यह माना जा रहा था कि अब इस अवैध निर्माण पर पूरी तरह रोक लग जाएगी।

हालांकि, सबसे चौंकाने वाला मोड़ इसके बाद सामने आया। जब सील तोड़कर दोबारा उसी स्थान पर निर्माण शुरू कर दिया गया और अब वहाँ कमर्शियल बेसमेंट के साथ लगभग 6 मंजिला इमारत, जिसे स्थानीय लोग “मिनी मॉल” कह रहे हैं, तेजी से खड़ी की जा रही है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल उठाती है, बल्कि कानून के प्रति खुलेआम चुनौती भी मानी जा रही है।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि यह जमीन दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की नोटिफाइड/सरकारी भूमि है, जिस पर बिना किसी स्वीकृत नक्शे के निर्माण किया जा रहा है। यह सीधे तौर पर दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 की धारा 14 और 29 का उल्लंघन है, साथ ही नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 343 और 345A के अंतर्गत भी यह एक गंभीर अपराध बनता है।

इस पूरे मामले में अमरोहा से सांसद कंवर सिंह तंवर का नाम सामने आना इसे और संवेदनशील बना देता है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि उन्होंने अपने पद और राजनीतिक प्रभाव का उपयोग करते हुए इस निर्माण को संरक्षण दिया। इतना ही नहीं, निर्माण स्थल पर उनका नाम-बोर्ड लगाए जाने और राजनीतिक दबाव बनाए जाने की भी बात कही जा रही है।

मामले को और विवादित बनाता है यह आरोप कि निर्माण स्थल पर माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरें लगाकर कार्रवाई को प्रभावित करने की कोशिश की गई। यदि ऐसा है, तो यह न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि देश के सर्वोच्च पद की छवि का दुरुपयोग भी माना जा सकता है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की साफ-सुथरी और ईमानदार छवि, जो देश-विदेश में स्थापित है, उसे खराब करने का प्रयास किया जा रहा है।

इसके साथ ही SDM साकेत, MCD ग्रीन पार्क के संबंधित अधिकारी, थाना मैदानगढ़ी और हौज खास तहसील के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में आरोप है कि या तो इन अधिकारियों ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया या फिर जानबूझकर इस अवैध निर्माण को नजरअंदाज किया गया। यहां तक कि करोड़ों रुपये की कथित रिश्वत और मिलीभगत के आरोप भी लगाए गए हैं, जो इस मामले को और गंभीर बना देते हैं।

कानूनी रूप से देखें तो इस प्रकरण में कई धाराओं के उल्लंघन की आशंका जताई जा रही है, जिनमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218, IPC की धारा 217 और 218, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 तथा दिल्ली विकास और नगर निगम से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने पुलिस, DDA, MCD और राजस्व विभाग सहित कई अधिकारियों को बार-बार शिकायतें दीं, लेकिन किसी भी स्तर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। यही कारण है कि यह मामला अब सिर्फ एक अवैध निर्माण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक संरक्षण का प्रतीक बन गया है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पूरे मामले में संसद की याचिका समिति, CBI और ACB से निष्पक्ष जांच, संबंधित अधिकारियों और नामित व्यक्तियों के खिलाफ FIR दर्ज करने, निर्माण को तुरंत रोकने, दोबारा डिमोलिशन और सीलिंग की कार्रवाई करने, तथा दोषी अधिकारियों को निलंबित करने की मांग की है। इसके अलावा वित्तीय लेन-देन और कॉल रिकॉर्ड की जांच तथा उच्चस्तरीय मॉनिटरिंग की भी मांग उठाई गई है।

यह मामला अब एक बड़े सवाल के रूप में सामने खड़ा है-क्या कानून केवल आम नागरिकों के लिए है, या फिर राजनीतिक प्रभाव के सामने नियमों की कोई अहमियत नहीं रह जाती? छतरपुर का यह विवाद न केवल पर्यावरण और शहरी नियोजन से जुड़ा मुद्दा है, बल्कि यह शासन व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही की भी कड़ी परीक्षा बन चुका है।

Kinni Times
Author: Kinni Times