Supreme Court of India ने साफ कहा है कि जजों पर निराधार और लापरवाह आरोप लगाना न्यायिक स्वतंत्रता की बुनियाद पर सीधा हमला है और इसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने एक वकील के खिलाफ चल रही अवमानना कार्यवाही में दखल देने से इनकार करते हुए यह टिप्पणी की। मामला Bombay High Court के एक मौजूदा जज पर लगाए गए आरोपों से जुड़ा था, जिसमें राजनीतिक संबंधों जैसे गंभीर दावे भी शामिल थे।

जस्टिस Vikram Nath और Sandeep Mehta की बेंच ने कहा कि अगर इस तरह के आरोपों पर रोक नहीं लगी, तो इससे आम जनता का न्यायपालिका पर भरोसा कमजोर हो सकता है।
🔍 आलोचना बनाम आरोप—क्या कहा कोर्ट ने?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
न्यायिक फैसलों की निष्पक्ष और तर्कसंगत आलोचना पूरी तरह वैध है
लेकिन जजों पर निजी और बेबुनियाद आरोप लगाना गलत है
ऐसे आरोप पुख्ता सबूतों पर आधारित होने चाहिए और कानून के तहत ही उठाए जाने चाहिए
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी फैसले को चुनौती देना हर व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन यह चुनौती संयम और मर्यादा के साथ होनी चाहिए, न कि जज की ईमानदारी पर सवाल उठाकर।
📢 प्रेस कॉन्फ्रेंस पर भी टिप्पणी
अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि किसी मौजूदा जज पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सार्वजनिक रूप से आरोप लगाना “हल्की बात” नहीं है और इससे न्याय व्यवस्था की साख को नुकसान पहुंच सकता है।
👉 निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट के इस बयान से साफ है कि लोकतंत्र में आलोचना की आजादी है, लेकिन इसकी एक सीमा है। बिना सबूत जजों पर आरोप लगाना न सिर्फ गलत है, बल्कि न्यायिक व्यवस्था को भी कमजोर करता है।
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