फर्जी जमानत आदेश बनाकर लाखों की ठगी, आरोपी वकील को हाईकोर्ट से राहत नहीं

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चंडीगढ़ से एक बड़ी कानूनी खबर सामने आई है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने फर्जी जमानत आदेश तैयार कर शिकायतकर्ताओं से करीब ₹10.92 लाख की कथित ठगी करने के आरोपी वकील की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।

मामले की सुनवाई के दौरान माननीय जस्टिस दीपक गुप्ता ने स्पष्ट कहा कि किसी व्यक्ति का वकील होना उसे कानून से ऊपर नहीं बनाता। अदालत ने साफ किया कि अग्रिम जमानत देते समय केवल कानूनी मानकों—जैसे आरोपों की गंभीरता, आरोपी की भूमिका, जांच पर असर और हिरासत में पूछताछ की जरूरत—को ही देखा जाता है।

यह मामला 13 मई 2026 को चंडीगढ़ के सेक्टर-39 थाना में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, उन्होंने अपने जेल में बंद रिश्तेदार की जमानत कराने के लिए आरोपी वकील से संपर्क किया था। आरोप है कि वकील ने खुद को न्यायिक अधिकारियों से प्रभावशाली संबंध रखने वाला बताकर भरोसा जीता और जमानत दिलाने के नाम पर बैंक ट्रांसफर व नकद के जरिए करीब ₹10.92 लाख ले लिए।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि बाद में उन्हें हाईकोर्ट का एक कथित जमानत आदेश दिखाया गया, लेकिन दस्तावेज संदिग्ध लगा क्योंकि उस पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं थी। जांच में सामने आया कि संबंधित जमानत याचिका अदालत में दाखिल ही नहीं की गई थी।

वहीं आरोपी पक्ष ने अदालत में दलील दी कि वह एक पंजीकृत अधिवक्ता है और शिकायतकर्ता उसके पेशेवर क्लाइंट थे। उसके अनुसार यह केवल फीस से जुड़ा दीवानी विवाद है, जिसे गलत तरीके से आपराधिक मामला बनाया गया है।

हालांकि राज्य सरकार ने इस दलील का कड़ा विरोध किया। अदालत को बताया गया कि बैंक रिकॉर्ड, दस्तावेजी साक्ष्य और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री आरोपों की पुष्टि कर रहे हैं। यह भी कहा गया कि शिकायतकर्ताओं ने रकम जुटाने के लिए कर्ज लिया और अपनी संपत्ति तक गिरवी रखी। साथ ही आरोपी कथित रूप से गिरफ्तारी से बच रहा है और उसके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की फोरेंसिक जांच जारी है।

हाईकोर्ट ने माना कि उपलब्ध रिकॉर्ड प्रथम दृष्टया यह दर्शाते हैं कि आरोपी ने ₹10.92 लाख प्राप्त किए थे और मामला सिर्फ फीस विवाद तक सीमित नहीं है। अदालत ने कहा कि लोगों को गुमराह करना, सरकारी अधिकारियों पर प्रभाव होने का दावा करना और कथित रूप से फर्जी न्यायिक आदेश तैयार करना न्याय व्यवस्था पर सीधा हमला है।

फोरेंसिक जांच लंबित होने, आरोपी के फरार रहने और हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता को देखते हुए अदालत ने कहा कि इस स्तर पर अग्रिम जमानत देना उचित नहीं होगा। इसी के साथ हाईकोर्ट ने आरोपी वकील की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

यह फैसला एक बार फिर साबित करता है कि कानून की नजर में सभी बराबर हैं और कोई भी व्यक्ति, चाहे उसका पेशा या पद कुछ भी हो, कानून से ऊपर नहीं है।

Kinni Times
Author: Kinni Times