दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 26 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति

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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 26 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दे दी है। अवकाशकालीन न्यायाधीश जस्टिस मिनी पुष्करणा ने यह आदेश पारित किया और साथ ही अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) को पूरी मेडिकल प्रक्रिया का खर्च उठाने का निर्देश भी दिया।

यह याचिका नाबालिग पीड़िता की ओर से उसके पिता द्वारा दायर की गई थी। याचिका में कहा गया कि पीड़िता और उसका परिवार गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहते, क्योंकि इससे बच्ची को गंभीर मानसिक आघात और भावनात्मक पीड़ा झेलनी पड़ सकती है। अदालत को बताया गया कि गर्भावस्था जारी रहने से पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत पीड़िता को सुरक्षित और सम्मानजनक चिकित्सा सहायता मिलनी चाहिए।

सुनवाई के दौरान AIIMS मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट अदालत में पेश की गई, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि नाबालिग गर्भसमापन प्रक्रिया के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट है। राज्य सरकार की ओर से भी अदालत को बताया गया कि मेडिकल टर्मिनेशन कराए जाने पर सरकार को कोई आपत्ति नहीं है।

दोनों पक्षों की दलीलों, मेडिकल बोर्ड की सिफारिश और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाईकोर्ट ने गर्भसमापन की अनुमति प्रदान कर दी।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी निर्देश दिया कि आपराधिक मामले की जांच और ट्रायल के लिए आवश्यक DNA परीक्षण हेतु गर्भस्थ शिशु के ऊतकों को सुरक्षित रखा जाए। साथ ही यदि प्रक्रिया के दौरान शिशु जीवित जन्म लेता है, तो उसे तत्काल आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाए और बाद में संबंधित प्राधिकरण कानून के अनुसार गोद लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ाए।

यह फैसला दर्शाता है कि न्यायपालिका संवेदनशील मामलों में पीड़िता के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति और गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। साथ ही यह निर्णय दुष्कर्म पीड़िताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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Kinni Times
Author: Kinni Times