दिल्ली में शुरू हुई ‘क्लाउड सीडिंग’ प्रक्रिया, मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा बोले — कुछ घंटों में हो सकती है बारिश

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राजधानी दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। मंगलवार को दिल्ली में ‘क्लाउड सीडिंग’ यानी कृत्रिम वर्षा की प्रक्रिया शुरू की गई। यह प्रयोग दिल्ली के बाहरी इलाकों — बुराड़ी से मयूर विहार तक किया गया।

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि यह क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया आईआईटी कानपुर की देखरेख में की गई है। इसके लिए सेसना एयरक्राफ्ट ने कानपुर से उड़ान भरकर मेरठ होते हुए दिल्ली में प्रवेश किया और शहर के कई इलाकों — खेकड़ा, बुराड़ी, नॉर्थ करोल बाग़, मयूर विहार, सादकपुर और भोजपुर — में बादलों में रासायनिक मिश्रण छोड़ा गया।

मंत्री सिरसा ने कहा कि इस प्रक्रिया में आठ फ्लेयर्स का इस्तेमाल किया गया, जिनमें सिल्वर आयोडाइड, पोटैशियम क्लोराइड और सोडियम क्लोराइड जैसे रासायन डाले गए। प्रत्येक फ्लेयर करीब दो से ढाई किलो का होता है और दो मिनट तक जलता है, जिससे रसायन बादलों में फैल जाते हैं। यह पूरा ऑपरेशन करीब आधा घंटा चला।

आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 15 मिनट से चार घंटे के भीतर बारिश हो सकती है, हालांकि नमी कम होने के कारण यह हल्की बारिश होगी। सिरसा ने बताया कि मंगलवार को क्लाउड सीडिंग के दूसरे और तीसरे ट्रायल भी किए जाएंगे। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो फरवरी तक दिल्ली में नियमित क्लाउड सीडिंग की योजना बनाई जाएगी।

इस बीच विपक्ष ने सरकार के दावों पर सवाल उठाए हैं। आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि सरकार प्राकृतिक बारिश का श्रेय खुद ले रही है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “बीजेपी सरकार इंद्र देवता के काम का भी क्रेडिट ले सकती है, क्योंकि इंद्र देवता तो प्रेस कॉन्फ्रेंस करने नहीं आएंगे।”

क्या है क्लाउड सीडिंग तकनीक?

‘क्लाउड सीडिंग’ दो शब्दों से बना है — क्लाउड यानी बादल और सीडिंग यानी बीज बोना। इस प्रक्रिया में विमान या ड्रोन की मदद से सिल्वर आयोडाइड, पोटैशियम क्लोराइड और सोडियम क्लोराइड जैसे पदार्थ बादलों में छोड़े जाते हैं। ये रसायन बादलों में मौजूद पानी की बूंदों को जमा कर बर्फ के कणों में बदल देते हैं। फिर ये कण आपस में मिलकर भारी हो जाते हैं और बारिश के रूप में जमीन पर गिरते हैं।

इस तकनीक का आविष्कार अमेरिकी वैज्ञानिक विंसेंट जे. शेफ़र ने किया था। आज यह तकनीक अमेरिका, चीन, और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों में भी वायु प्रदूषण और सूखे से निपटने के लिए इस्तेमाल की जा रही है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, जहां पर्याप्त बादल नहीं होते, वहां क्लाउड सीडिंग संभव नहीं है। इसलिए पहले बादलों की ऊंचाई, नमी और तापमान का विश्लेषण किया जाता है। कुछ देशों में ड्रोन द्वारा इलेक्ट्रिक शॉक देकर भी बादलों से बारिश कराई जाती है — जैसे UAE ने वर्ष 2021 में इस तकनीक का सफल प्रयोग किया था।

दिल्ली सरकार को उम्मीद है कि अगर यह प्रयोग सफल रहा, तो राजधानी में वायु गुणवत्ता में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा और लोगों को प्रदूषण से राहत मिलेगी।

Kinni Times
Author: Kinni Times

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