दक्षिण दिल्ली का असोला-फतेहपुर बेरी गांव आज पूरे देश में बाउंसर और पहलवानों की पहचान बन चुका है। इस गांव को लोग “बाउंसरों की फैक्ट्री” भी कहते हैं, क्योंकि यहां के ज्यादातर युवा जिम, अखाड़ा और पहलवानी से जुड़े हुए हैं। गांव का लगभग हर दूसरा घर किसी न किसी पहलवान या बाउंसर से जुड़ा हुआ है।
बताया जाता है कि साल 1995 में विजय तंवर नाम के पहलवान ने सबसे पहले बाउंसर का काम शुरू किया था। इसके बाद गांव के युवाओं ने भी इसी पेशे को अपनाना शुरू कर दिया। आज यहां का बच्चा-बच्चा मजबूत शरीर और पहलवान जैसी पहचान बनाने का सपना देखता है।

पहलवान बनने के लिए केवल ताकत ही नहीं, बल्कि कठिन ट्रेनिंग, सही डाइट और पर्याप्त आराम भी जरूरी माना जाता है। पुराने दौर के मशहूर पहलवान दारा सिंह और गामा पहलवान की डाइट आज भी चर्चा में रहती है। जानकारी के मुताबिक दारा सिंह रोजाना करीब 8000 कैलोरी और गामा पहलवान 30000 कैलोरी तक की डाइट लेते थे। हालांकि उस समय कैलोरी गिनने का चलन कम था, लेकिन दूध, दही, घी और देसी खानपान पर ज्यादा जोर दिया जाता था।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी पहलवान या एथलीट के लिए ट्रेनिंग सबसे अहम होती है। कई पहलवान रोजाना 3 से 4 घंटे तक अखाड़े या जिम में पसीना बहाते हैं। ट्रेनिंग के बाद शरीर की रिकवरी और सही खानपान बेहद जरूरी होता है।
स्पोर्ट्स अथॉरिटी और एनएसएनआईएस जैसी संस्थाओं के अनुसार पहलवानों की डाइट में फल, सब्जियां, अनाज, डेयरी उत्पाद और प्रोटीन से भरपूर चीजें शामिल होनी चाहिए। अंडा, दूध, दाल, पनीर, चिकन, सोयाबीन और सूखे मेवे जैसे खाद्य पदार्थ शरीर को ताकत देने में मदद करते हैं।
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि जरूरत से ज्यादा प्रोटीन या बिना एक्सरसाइज के अधिक खाना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है। फिटनेस के साथ शरीर में मसल्स और फैट का संतुलन बनाए रखना भी बेहद जरूरी है।
असोला-फतेहपुर बेरी आज सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि युवाओं के लिए फिटनेस और पहलवानी की प्रेरणा बन चुका है, जहां मेहनत, अनुशासन और देसी खानपान के दम पर युवा अपनी अलग पहचान बना रहे हैं।
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