विदेश मंत्री एस जयशंकर ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में वैश्विक व्यवस्था के तेजी से बदलते स्वरूप पर एक व्यापक और महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका ने अपनी पसंद और रणनीतिक प्राथमिकताओं के तहत खुद को एक अधिक अकेली शक्ति के रूप में ढाल लिया है। जयशंकर के मुताबिक, अमेरिकी नीतियों में आया यह बड़ा बदलाव और दूसरी तरफ वैश्विक मंच पर चीन का लगातार फैलता प्रभाव दुनिया के राजनीतिक व आर्थिक समीकरणों को पूरी तरह से उलट रहा है। उन्होंने कहा कि आज के वैश्विक परिदृश्य की सबसे बड़ी विशेषता वॉशिंगटन का तेजी से बदलता रुख है, जिसके चलते वह पहले की तुलना में अधिक अलग-थलग स्थिति में पहुंच गया है, जबकि चीन का उभार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को प्रभावित करने वाला दूसरा सबसे बड़ा कारक बन चुका है।
चीन की बढ़ती आर्थिक ताकत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
चीन की बढ़ती ताकत का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री ने बताया कि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अकेले चीन की हिस्सेदारी लगभग एक तिहाई है। उनकी यह विशाल आर्थिक क्षमता अब धीरे-धीरे उनके राजनीतिक प्रभाव में भी तब्दील हो रही है। अमेरिका और चीन के बीच चल रही रणनीतिक व आर्थिक प्रतिस्पर्धा बेहद तीव्र हो चुकी है, और इसका दायरा केवल दोनों देशों तक सीमित न रहकर पूरी दुनिया पर असर डाल रहा है। आज के दौर में देश अपनी आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक ताकत को वैश्विक स्तर पर प्रभाव जमाने के एक बड़े साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, हालांकि इसके बावजूद देशों की आपसी आर्थिक निर्भरता अभी भी बनी हुई है।
‘मिडिल पावर’ देशों की बदलती भूमिका और रणनीतिक स्वायत्तता
जयशंकर ने रेखांकित किया कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं और ‘मिडिल पावर’ देश अब अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर पहले से कहीं अधिक जागरूक हो चुके हैं। ये देश अपनी आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के साथ-साथ अपनी साझेदारियों में विविधता (Diversification) ला रहे हैं। भारत में प्रचलित ‘आत्मनिर्भर’ शब्द का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आज दुनिया के कई देश अपनी क्षमताओं और हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। राष्ट्र अब किसी एक ही साझेदार देश पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपने जोखिम को कम करने (De-risking) और अलग-अलग देशों के साथ मिलकर सहयोग के नए रास्ते तलाशने पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
सहयोग के नए तौर-तरीके और लचीली वैश्विक व्यवस्था
विदेश मंत्री के अनुसार, आधुनिक दौर में देशों के बीच आपसी सहयोग के लिए हर मुद्दे पर पूरी तरह से एक जैसी राय या सहमति होना कतई जरूरी नहीं है। यदि दो या उससे अधिक देशों के रणनीतिक हितों में पर्याप्त समानता है, तो वे किसी विशिष्ट एजेंडे पर मिलकर काम कर सकते हैं। उन्होंने ‘क्वाड’ (Quad) और ‘ब्रिक्स’ (BRICS) जैसे बहुपक्षीय समूहों का हवाला देते हुए कहा कि राष्ट्र अपने हितों के मुताबिक सहयोग के नए आयाम गढ़ रहे हैं। भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर और इंटरनेशनल सोलर अलायंस जैसी पहलों का जिक्र करते हुए उन्होंने अंत में कहा कि दुनिया भर के देश अपनी व्यवस्था और सहयोग के नए तरीके खुद विकसित कर रहे हैं, जो धीरे-धीरे एक अधिक लचीली और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को आकार दे रहे हैं।








