जलवायु परिवर्तन के बीच अंटार्कटिका की बर्फ पर एक नया खतरा सामने आया है। वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन के मुताबिक, पेंगुइन और अन्य समुद्री पक्षियों के मल से मिलने वाला फॉस्फेट बर्फ पर हरी शैवाल की वृद्धि को बढ़ावा दे रहा है। शैवाल के फैलने से बर्फ की सफेद सतह का रंग हरा होने लगता है। इससे सूर्य की रोशनी को परावर्तित करने की बर्फ की क्षमता कम हो जाती है और वह अधिक सौर ऊर्जा सोखने लगती है। इसका असर बर्फ के पिघलने की रफ्तार पर पड़ सकता है।
अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन की ओर से 7 अक्टूबर 2026 को जारी जानकारी के अनुसार, यह अध्ययन अंटार्कटिक प्रायद्वीप के तटीय इलाकों में बर्फ पर उगने वाली शैवाल और वन्यजीवों से मिलने वाले पोषक तत्वों के बीच संबंध को समझने के लिए किया गया। इसके निष्कर्ष जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: बायोजियोसाइंसेज में प्रकाशित हुए हैं।
*पक्षियों के मल से कैसे बढ़ रही है शैवाल?*
पेंगुइन और दूसरे समुद्री पक्षी समुद्र में भोजन करते हैं। उनके मल के जरिए समुद्र से मिलने वाले पोषक तत्व आसपास की बर्फ और बर्फीले मैदानों तक पहुंचते हैं। इनमें फॉस्फेट भी शामिल है, जो शैवाल की वृद्धि के लिए जरूरी पोषक तत्व है। जब बर्फ पर इन पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है, तो शैवाल को पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां मिलती हैं। नतीजतन, कुछ इलाकों में हरी शैवाल के घने समूह विकसित होने लगते हैं।
शोधकर्ताओं ने अंटार्कटिक प्रायद्वीप के पश्चिमी हिस्से में नौ तटीय स्थानों से 2024-25 के दक्षिणी गोलार्ध के ग्रीष्मकाल के दौरान बर्फ के 111 नमूने एकत्र किए। इन नमूनों में साफ बर्फ, लाल शैवाल वाली बर्फ और हरी शैवाल वाली बर्फ की तुलना की गई। अध्ययन में हरी शैवाल वाली बर्फ में फॉस्फेट की औसत मध्यवर्ती सांद्रता लगभग 114 माइक्रोमोल प्रति लीटर पाई गई, जबकि लाल शैवाल वाली बर्फ में यह लगभग 11.4 माइक्रोमोल प्रति लीटर थी। साफ बर्फ में यह मात्रा लगभग 1.54 माइक्रोमोल प्रति लीटर रही। यानी हरी शैवाल वाली बर्फ में फॉस्फेट का स्तर लाल शैवाल वाली बर्फ की तुलना में करीब दस गुना और साफ बर्फ की तुलना में लगभग 70 गुना अधिक था।
*हरी बर्फ सूर्य की ऊर्जा ज्यादा सोखती है*
सामान्य सफेद बर्फ सूर्य की रोशनी का बड़ा हिस्सा वापस परावर्तित कर देती है। लेकिन जब उसकी सतह पर शैवाल फैलती है, तो बर्फ का रंग और प्रकाश को परावर्तित करने की क्षमता बदल जाती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, हरी शैवाल से ढकी बर्फ साफ सफेद बर्फ की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक सौर ऊर्जा सोख सकती है। इससे सतह गर्म होने और बर्फ पिघलने की प्रक्रिया तेज होने की आशंका रहती है।
यह प्रक्रिया जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और जटिल बना सकती है। तापमान बढ़ने से बर्फ पर शैवाल के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बढ़ सकती हैं। वहीं, शैवाल के कारण बर्फ की सतह का गहरा होना अधिक ऊर्जा के अवशोषण को बढ़ावा दे सकता है। इस तरह तापमान, पोषक तत्वों और शैवाल की वृद्धि के बीच संबंध बर्फ के पिघलने को प्रभावित कर सकता है।
*लाल और हरी शैवाल में क्या है अंतर?*
अध्ययन के अनुसार, शैवाल का रंग उसकी वृद्धि और पर्यावरणीय परिस्थितियों से जुड़ा होता है। पोषक तत्वों की पर्याप्त उपलब्धता होने पर हरी शैवाल अधिक सक्रिय होकर बढ़ सकती है। दूसरी ओर, कठिन परिस्थितियों या पोषक तत्वों की कमी में कुछ शैवाल लाल रंग के सुरक्षात्मक वर्णक विकसित करती हैं। लाल और हरी शैवाल दोनों ही बर्फ की सतह द्वारा सूर्य की ऊर्जा सोखने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं, हालांकि इनका प्रभाव अलग-अलग हो सकता है।
*जलवायु परिवर्तन के अध्ययन में क्यों अहम है यह खोज?*
अंटार्कटिका की बर्फ के पिघलने का अध्ययन करते समय तापमान, सूर्य की रोशनी और बर्फ की भौतिक विशेषताओं को ध्यान में रखा जाता है। नया अध्ययन बताता है कि पक्षियों जैसे जीवों से मिलने वाले पोषक तत्व और उनसे बढ़ने वाली शैवाल भी इस प्रक्रिया में भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए भविष्य में अंटार्कटिका के बर्फीले क्षेत्रों और बर्फ-मुक्त इलाकों के विस्तार का अनुमान लगाते समय इन जैविक प्रक्रियाओं को भी शामिल करना जरूरी हो सकता है।
हालांकि, अध्ययन यह साबित नहीं करता कि अंटार्कटिका की बर्फ के पिघलने का मुख्य कारण पक्षियों का मल है। इसके निष्कर्ष बताते हैं कि वन्यजीवों से मिलने वाला फॉस्फेट हरी शैवाल की वृद्धि और बर्फ की सतह के गहरे होने से जुड़ा है, जो पिघलने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इस प्रभाव की व्यापकता और भविष्य में इसके परिणामों को समझने के लिए आगे भी शोध की जरूरत है।








