अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने खुलासा किया है कि अमेरिका ने रूस से ऊर्जा खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ सख्त व्यापारिक कार्रवाई करने के लिए यूरोपीय देशों से समर्थन मांगा था, लेकिन यूरोपीय देशों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। बेसेंट के मुताबिक, अमेरिका चाहता था कि रूस से तेल और अन्य ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाने के लिए उसके यूरोपीय सहयोगी भी सेकेंडरी टैरिफ लगाने की कार्रवाई में शामिल हों।
स्कॉट बेसेंट ने यह बात अमेरिकी समाचार चैनल NBC के कार्यक्रम ‘Meet the Press’ में दिए गए एक इंटरव्यू के दौरान कही। उन्होंने बताया कि अमेरिकी प्रशासन ने इसी साल वसंत ऋतु में यूरोपीय सहयोगियों से भारत और चीन पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने के लिए साथ आने का अनुरोध किया था। हालांकि, यूरोपीय देशों ने इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं जताई। बेसेंट ने सवाल उठाया कि रूस पर आर्थिक दबाव बनाने की जिम्मेदारी अकेले अमेरिका ही क्यों उठाए।
रूस से ऊर्जा खरीद पर अमेरिका की रणनीति
अमेरिका लंबे समय से रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई को सीमित करने के लिए आर्थिक प्रतिबंधों और टैरिफ का इस्तेमाल करता रहा है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव डालकर मॉस्को की युद्ध संबंधी गतिविधियों के लिए उपलब्ध राजस्व को कम किया जा सकता है।
इसी रणनीति के तहत अमेरिका ने भारत और चीन पर भी अतिरिक्त व्यापारिक शुल्क लगाने के लिए यूरोपीय देशों का समर्थन मांगा था। सेकेंडरी टैरिफ का उद्देश्य रूस से ऊर्जा खरीदने वाले तीसरे देशों के उत्पादों पर शुल्क लगाकर उन देशों के लिए रूस से व्यापार करना महंगा बनाना है। हालांकि, यूरोपीय देशों के समर्थन नहीं देने से अमेरिका की संयुक्त कार्रवाई की कोशिश को झटका लगा।
यूरोप पर भी रूस से ऊर्जा खरीदने का आरोप
स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि यूरोपीय देश एक ओर यूक्रेन का समर्थन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर रूस से ऊर्जा खरीदना जारी रखे हुए हैं। बेसेंट ने रूस की यमाल ऊर्जा परियोजना से भेजी गई खेपों का हवाला देते हुए कहा कि साल के शुरुआती छह महीनों में कुल 140 खेपें रवाना हुईं, जिनमें से 136 यूरोपीय देशों तक पहुंचीं। उनके अनुसार, इन खेपों का मूल्य 8 अरब डॉलर से अधिक था।
बेसेंट ने बेल्जियम, स्पेन, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि रूस से ऊर्जा खरीद के जरिए उसे बड़ी रकम मिल रही है। यह उनका दावा है, जिसके जरिए उन्होंने यूरोपीय देशों की नीतियों में विरोधाभास होने का आरोप लगाया।
भारत की ऊर्जा जरूरतों का भी उठ रहा सवाल
भारत दुनिया के प्रमुख ऊर्जा आयातक देशों में शामिल है और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदता है। रूस से तेल खरीदना भारत की ऊर्जा आपूर्ति और लागत से जुड़ा अहम मुद्दा रहा है। भारत का पक्ष रहा है कि ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसले देश की जरूरतों और आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी भारत की ऊर्जा जरूरतों का उल्लेख करते हुए कहा है कि किसी देश के लिए एक दिन में ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों को पूरी तरह बदलना आसान नहीं होता। उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी और साझेदार भी बताया।
आगे क्या हो सकता है?
बेसेंट के बयान से साफ है कि अमेरिकी प्रशासन रूस पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए दूसरे देशों की भागीदारी चाहता है। हालांकि, यूरोपीय देशों ने भारत और चीन पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने के अमेरिकी प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। ऐसे में रूस से ऊर्जा खरीद, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका तथा उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच नीतिगत मतभेद फिर चर्चा में आ गए हैं।
आने वाले समय में इस मुद्दे पर अमेरिका की रणनीति और यूरोपीय देशों की प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी। इसका असर भारत, चीन और रूस के साथ होने वाले ऊर्जा व्यापार पर भी पड़ सकता है।








