राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने के फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में घमासान मच गया है। जहाँ एक तरफ विपक्ष इस फैसले को जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बता रहा है, वहीं सत्ताधारी दल की ओर से तीखा पलटवार किया जा रहा है। इस पूरे विवाद ने अब एक बड़े राजनीतिक संघर्ष का रूप ले लिया है, जिसमें पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं।
स्मृति ईरानी का राहुल गांधी पर तीखा हमला
भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता और स्मृति ईरानी ने एक इंटरव्यू के दौरान इस मुद्दे पर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को आड़े हाथों लिया। स्मृति ईरानी ने सवाल उठाया कि आखिर जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में नोटिफाई किसने किया था? उन्होंने दिल्ली पुलिस के फैसले का खुलकर समर्थन करते हुए कहा कि राजधानी में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रदर्शन से जुड़े तय नियमों और कड़े अनुशासन का पालन होना जरूरी है। उन्होंने यह भी गंभीर आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की गई थी, और राहुल गांधी से सवाल किया कि क्या उन्होंने कभी इस हिंसा की निंदा की या प्रदर्शनकारियों से ऐसा न करने की अपील की थी?
राहुल गांधी का पलटवार और प्रदर्शनकारियों के आरोप
इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के ज़रिए कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने अपने बयान में कहा था कि जंतर-मंतर देश के आम लोगों का है और वे इसे वापस लेकर रहेंगे। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों की तरफ से भी पुलिस प्रशासन पर कार्रवाई के दौरान ज्यादती करने और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने के आरोप लगाए गए हैं, जिससे यह मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है।
बोट क्लब से जंतर-मंतर और अब नए नियमों तक का सफर
दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के इतिहास पर नज़र डालें तो एक समय में बड़े आंदोलन ‘बोट क्लब’ के पास आयोजित होते थे। लेकिन साल 1988 में प्रसिद्ध किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के ऐतिहासिक आंदोलन के बाद वहाँ प्रदर्शनों पर कड़ी पाबंदियां लगा दी गईं। इसके बाद, साल 1993 में प्रदर्शन स्थलों को औपचारिक रूप से जंतर-मंतर पर स्थानांतरित किया गया था। अब जबकि इसे भी सूची से हटा दिया गया है, तो यह सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और शहर की सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।








