इंटरनेट पर फर्जी प्रेस आईडी कार्ड बनाने का कारोबार तेजी से फैल रहा है। अक्टूबर के पहले 10 दिनों में कई वेबसाइटों पर ऐसे कार्ड बनाने की गतिविधियां सामने आई हैं। हैरानी की बात यह है कि इन वेबसाइटों के जरिए महज 200 से 500 रुपये खर्च करके प्रेस आईडी कार्ड तैयार कराए जा सकते हैं। इन कार्डों को जारी करने से पहले न तो संबंधित व्यक्ति की पहचान की उचित जांच की जाती है और न ही उसके किसी मीडिया संस्थान से जुड़े होने की पुष्टि की जाती है।
जांच में सामने आया है कि ये वेबसाइटें खुद कोई मीडिया संस्थान नहीं हैं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में कार्ड तैयार करने की सुविधा देती हैं। ऐसे में इन कार्डों की वैधता और उनका इस्तेमाल गंभीर सवाल खड़े करता है। आधिकारिक प्रेस पहचान पत्र संबंधित मीडिया संस्थान द्वारा अपने अधिकृत प्रतिनिधियों को जारी किए जाते हैं। केवल किसी वेबसाइट से कार्ड बनवा लेने भर से कोई व्यक्ति पत्रकार नहीं बन जाता और न ही उसे सरकारी मान्यता प्राप्त हो जाती है।
इस मामले को लेकर दिल्ली पुलिस भी सतर्क है। पुलिस की स्पेशल सेल और साइबर पुलिस फर्जी पहचान के जरिए भ्रामक जानकारी और फुटेज फैलाने वालों पर नजर रख रही हैं। अक्टूबर के पहले सप्ताह में दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर कथित तौर पर फर्जी पहचान का इस्तेमाल कर भ्रामक फुटेज फैलाने के मामले में एक युवक को गिरफ्तार किया है।
अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त मंजीत श्योराण के मुताबिक, कुछ लोग पत्रकारों का भेष धारण कर विरोध-प्रदर्शनों में शामिल हो जाते हैं। ऐसे लोगों की पहचान करने के लिए पुलिस जांच कर रही है। आशंका है कि फर्जी प्रेस कार्ड का इस्तेमाल अपनी पहचान छिपाने, लोगों पर अनुचित दबाव बनाने या भ्रामक सामग्री फैलाने के लिए किया जा सकता है।
सरकारी तंत्र की सख्ती और दिल्ली पुलिस की निगरानी के बावजूद ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर फर्जी प्रेस आईडी कार्ड तैयार करने का कारोबार चुनौती बना हुआ है। ऐसे में जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति की पत्रकारिता से जुड़ी पहचान की पुष्टि उसके संबंधित मीडिया संस्थान से की जाए और संदिग्ध कार्ड या वेबसाइट की जानकारी पुलिस को दी जाए।








