देश की राजनीति में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा देश भर में एनआरसी लागू करने और एनडीए शासित राज्यों में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यूसीसी लागू करने के संकल्प के बाद राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है।
ओवैसी का सरकार पर हमला, 2019 के आंदोलन की दिलाई याद
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्रीय गृह मंत्री के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार को 2019 में सीएए-एनआरसी के विरोध में हुए देशव्यापी आंदोलनों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस स्पष्टीकरण को याद रखना चाहिए, जिसमें एनआरसी लागू न करने की बात कही गई थी।
SIR प्रक्रिया पर चिंता: ओवैसी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि इस प्रक्रिया से आम नागरिकों, विशेषकर अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और प्रवासियों को अपने पुराने दस्तावेज जुटाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि एसआईआर से इतनी परेशानी है, तो एनआरसी का दायरा कितना जटिल होगा।
असम के अनुभव का हवाला: उन्होंने असम एनआरसी प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहा कि आम जनता के लिए अपनी नागरिकता साबित करना बेहद कठिन साबित हुआ है।
UCC पर गृह मंत्री का बड़ा बयान और राज्यों की स्थिति
दूसरी तरफ, समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर सरकार अपनी तैयारियों को आगे बढ़ा रही है। गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया है कि एनडीए शासित 21 राज्यों में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यूसीसी लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।
उत्तराखंड की पहल: उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहां फरवरी 2024 में यूसीसी कानून पारित होने के बाद जनवरी 2025 से इसे लागू किया जा चुका है।
अन्य राज्यों में प्रक्रिया: गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में यूसीसी से जुड़े कानूनों की प्रक्रिया प्रगति पर है, जबकि महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में इसके मसौदे को तैयार करने के लिए विशेष समितियों का गठन किया गया है।
एनआरसी और घुसपैठ का मुद्दा
अमित शाह ने एनआरसी के मुद्दे पर स्पष्ट किया है कि सरकार इस विषय पर एनडीए के सभी सहयोगी दलों के साथ संवाद कर रही है। सरकार का मुख्य उद्देश्य देश में मौजूद अवैध घुसपैठियों की पहचान कर कानूनी कार्रवाई करना है। मणिपुर में एनआरसी के लिए 1951 को आधार वर्ष बनाए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि व्यापक सहमति बनने के बाद ही आधिकारिक निर्णय की जानकारी साझा की जाएगी।
एक तरफ जहां सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और एक देश-एक कानून के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है, वहीं विपक्ष इसे सामाजिक ताने-बाने और नागरिकों के अधिकारों के लिहाज से चुनौती बता रहा है। आने वाले समय में इन दोनों संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक घमासान और तेज होने के पूरे आसार हैं।







