35 दिनों से सुलग रहा है पाक अधिकृत कश्मीर, रावलकोट से मुजफ्फराबाद तक विद्रोह
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में पिछले पांच हफ्तों से चल रहा जनआक्रोश अब एक पूर्ण नागरिक विद्रोह में बदल चुका है। रावलकोट के ईदगाह मैदान में उमड़े हजारों लोगों के हुजूम ने इस्लामाबाद और रावलपिंडी (पाकिस्तानी सेना मुख्यालय) की नींव हिला दी है। अवामी एक्शन कमेटी के नेता सरदार जावेद इकबाल ने दशकों से चले आ रहे पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा को ध्वस्त करते हुए खुले मंच से कहा, “78 साल से हमें श्रीनगर आजाद कराने का अफीम चटाया गया, लेकिन अब यह झूठ नहीं बिकेगा।” उन्होंने सीधे शब्दों में कहा कि घाटी की जनता को हक मांगने पर सिर्फ गोलियां और लाठियां ही नसीब हुई हैं।
“आटा-बिजली दो या रास्ता साफ करो”: सूबा बनने के खिलाफ आर-पार की लड़ाई
इस आंदोलन का सबसे बड़ा और कड़ा पहलू पाकिस्तान की उस प्रशासनिक चाल का विरोध है, जिसके तहत वह PoK को अपना पांचवां प्रांत (सूबा) घोषित करना चाहता है। रैली में गूंजते नारे “बच्चा-बच्चा कट मरेगा, POK सूबा नहीं बनेगा” ने साफ कर दिया है कि जनता अब पाकिस्तान के पूर्ण नियंत्रण को स्वीकार करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। 27 जुलाई को होने वाले स्थानीय चुनावों से ठीक पहले इस आक्रोश ने मुख्यधारा की पाकिस्तानी राजनीतिक पार्टियों को बैकफुट पर धकेल दिया है; कई इलाकों में नेताओं को चुनाव प्रचार तक नहीं करने दिया जा रहा है।
सेना की कथित गुंडागर्दी का वीडियो वायरल: इसी तनाव के बीच टट्टा पानी इलाके से एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है। दावा किया जा रहा है कि प्रदर्शनों से बौखलाई पाकिस्तानी सेना के जवानों ने एक स्थानीय दुकान का शटर तोड़कर नकदी और सामान लूट लिया। अवामी एक्शन कमेटी द्वारा शेयर किए गए इस वीडियो ने स्थानीय लोगों के गुस्से में घी का काम किया है।
15 जुलाई का ‘मुजफ्फराबाद मार्च’: पाकिस्तान के लिए ‘कयामत का दिन’?
PoK की जनता और आंदोलनकारी नेताओं ने अब आर-पार की जंग का ऐलान करते हुए 15 जुलाई को राजधानी मुजफ्फराबाद की ओर एक महामार्च का आह्वान किया है। इस मार्च को PoK के वजूद और भविष्य के लिए टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। कंगाली, महंगाई और भुखमरी से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए अपने ही कब्जे वाले इलाके में सेना के खिलाफ उठ खड़ा हुआ यह जनसैलाब आने वाले दिनों में एक बड़ी भू-राजनीतिक (Geo-political) मुसीबत बनने जा रहा है। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों की नजरें अब 15 जुलाई के इस महामुकाबले पर टिकी हैं।








