इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हलाला के नाम पर एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण और बाद में सामूहिक दुष्कर्म (गैंगरेप) के आरोपों से जुड़े बेहद गंभीर मामले में आरोपियों को कोई भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपियों द्वारा दायर की गई एफआईआर (FIR) रद्द करने की याचिकाओं को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक प्रथा या परंपरा की आड़ में इस तरह के घिनौने अपराधों को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कृत्यों को सही नहीं ठहराया जा सकता
यह आदेश जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ (Division Bench) ने मामले से जुड़ी चार आपराधिक रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए पारित किया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जो आरोप लगाए गए हैं, वे अत्यंत संवेदनशील और गंभीर प्रकृति के हैं। ऐसे मामलों में सत्यता का पता लगाने के लिए एक विस्तृत और निष्पक्ष आपराधिक जांच (Detailed Criminal Investigation) बेहद आवश्यक है। प्रारंभिक स्तर पर कोर्ट हस्तक्षेप करके एफआईआर को निरस्त नहीं कर सकता। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि देश का कानून सर्वोपरि है और किसी भी कथित धार्मिक रीति-रिवाज या प्रथा का हवाला देकर कानूनन अपराध की श्रेणी में आने वाले कृत्यों को सही नहीं ठहराया जा सकता, विशेषकर तब जब मामला किसी नाबालिग के शोषण से जुड़ा हो।
याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया
हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने मुख्य याचिका CRLP(A) 8465/2026 सहित उससे संबद्ध अन्य तीनों याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई की। गुण-दोष के आधार पर मामले को गंभीर पाते हुए कोर्ट ने सभी याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने इस मामले में आरोपियों को पूर्व में दी गई सभी तरह की अंतरिम राहतों (Interim Relief) को भी तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया है, जिसके बाद अब पुलिस के लिए आगे की सख्त दंडात्मक कार्रवाई और गिरफ्तारी का रास्ता साफ हो गया है।








