भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने पासपोर्ट को लेकर चल रही तमाम चर्चाओं और सवालों के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा स्पष्टीकरण जारी किया है। मंत्रालय ने साफ तौर पर कहा है कि पासपोर्ट मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला एक ‘ट्रैवल डॉक्यूमेंट’ (यात्रा दस्तावेज) और पहचान पत्र है, इसे भारतीय नागरिकता का अंतिम या अकाट्य सबूत नहीं माना जाना चाहिए। इस बयान के साथ ही विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट सेवाओं से जुड़े कई अहम आंकड़े भी साझा किए हैं।
कानूनी स्थिति पूरी तरह साफ हो चुकी
विदेश मंत्रालय ने इस विषय पर उठ रहे सवालों का सिलसिलेवार जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि यह कोई नया फैसला नहीं है। मंत्रालय ने कहा, “यह बात कल या पिछले 12 सालों में तय नहीं हुई है कि पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है। वास्तव में, पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का अंतिम सबूत रहा ही नहीं है।”अपने इस तर्क को मजबूती देने के लिए मंत्रालय ने पासपोर्ट एक्ट 1967 का हवाला दिया। मंत्रालय के मुताबिक, इस कानून में यह स्पष्ट प्रावधान है कि विशेष परिस्थितियों में पासपोर्ट उन लोगों को भी जारी किया जा सकता है जो भारत के नागरिक नहीं हैं। इसके अलावा, मंत्रालय ने यह भी याद दिलाया कि साल 2013 में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसलों से भी यह कानूनी स्थिति पूरी तरह साफ हो चुकी है कि पासपोर्ट को नागरिकता के पक्के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
सरकार लगातार नियमों को सरल और सुलभ बना रही
मंत्रालय ने बताया कि लगातार आसान होती प्रक्रियाओं के बीच भारतीय पासपोर्ट की वैश्विक पहुंच भी मजबूत हुई है। वर्तमान में भारतीय नागरिकों को दुनिया के 27 देशों में ‘वीजा-फ्री’ प्रवेश, 47 देशों में ‘वीजा ऑन अराइवल’ और 66 देशों में ‘ई-वीजा’ की आधुनिक सुविधा मिल रही है। हालांकि, आंकड़ों के लिहाज से देश की कुल आबादी के मुकाबले अभी भी केवल 10 प्रतिशत भारतीयों के पास ही वैध पासपोर्ट मौजूद है, जिसे बढ़ाने के लिए सरकार लगातार नियमों को सरल और सुलभ बना रही है।








