नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के छह बड़े अस्पतालों की आपातकालीन विभागों में पिछले तीन सालों में 2,04,758 लोगों ने तीव्र श्वसन संबंधी (एक्यूट रेस्पिरेट्री) समस्याओं — जैसे खांसी, सांस फूलना और सीने में जकड़न — के साथ इलाज के लिए संपर्क किया। इन मामलों में से 30,425 मरीजों की हालत इतनी गंभीर थी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
इस जानकारी को सरकार ने हाल ही में राज्यसभा में दी गयी जवाब-किताब में साझा किया। इस सवाल को उठाया था राज्यसभा सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने।
सरकार ने स्वीकार किया है कि वायु प्रदूषण — विशेषकर हवा में धूल, धुआं और हानिकारक कणों की बढ़ती मात्रा — एक्यूट श्वसन संक्रमण जैसी बीमारियों को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। खासकर उन लोगों के लिए जो पहले से कमजोर फेफड़ों, बच्चों, बुजुर्गों या अस्थमा आदि से पीड़ित हैं।
एक व्यापक अध्ययन का हवाला देते हुए, जिसमें हिस्सा लेने वालों में से 33,213 मरीजों (करीब 12.6%) का डेटा विश्लेषण योग्य पाया गया था, बताया गया कि जैसे-जैसे हवा की गुणवत्ता खराब हुई — इमरजेंसी में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या भी बढ़ी। हालांकि, सरकार ने ये भी कहा कि इस तरह के अध्ययन से यह तय करना मुश्किल है कि प्रदूषण और बीमारी के बीच “सीधा कारण-परिणाम” (causal link) है या नहीं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा है कि इस डेटा से यह स्पष्ट हो गया है कि प्रदूषण — विशेषकर दिल्ली जैसे बड़े शहरों में — सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर जोखिम बन चुका है।







