सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में अवैध निर्माण के मामलों पर सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि सिर्फ समय बीत जाने से कोई भी अवैध निर्माण वैध नहीं हो सकता। साथ ही, अधिकारियों की लापरवाही या कार्रवाई में देरी भी ऐसे निर्माणों को बचाने का आधार नहीं बनेगी।
मेरठ से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवैध निर्माण को केवल जुर्माना लेकर नियमित (कंपाउंड) करना कानून की भावना के खिलाफ है। अदालत ने इस व्यवस्था पर कड़ी आपत्ति जताते हुए राज्यों और स्थानीय निकायों को अवैध निर्माण के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
कोर्ट ने सभी राज्यों से कहा है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में अवैध निर्माण पर की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट 21 सितंबर तक सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत करें। अदालत ने इस मामले को पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी बताते हुए कहा कि अब नियमों का उल्लंघन करने वालों के प्रति नरमी नहीं बरती जाएगी।
इस फैसले का असर देश के सभी राज्यों और शहरों में देखने को मिल सकता है। जिन भवनों या कॉलोनियों का निर्माण बिना स्वीकृत नक्शे या नियमों के विपरीत हुआ है, उनके खिलाफ कार्रवाई तेज होने की संभावना है। साथ ही, केवल जुर्माना भरकर ऐसे निर्माणों को वैध कराने की व्यवस्था पर भी सख्ती बढ़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को शहरी विकास, नगर नियोजन और अवैध निर्माण पर नियंत्रण की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। अब यह देखना होगा कि राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय अदालत के निर्देशों का पालन किस तरह करते हैं।








