नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कथित जबरन वसूली के एक मामले में तीन पुलिसकर्मियों को मिली अग्रिम जमानत रद्द करते हुए कानून लागू करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जब जनता की सुरक्षा का दायित्व निभाने वाले ही अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने लगते हैं, तो आम नागरिक के लिए न्याय प्राप्त करना और भी कठिन हो जाता है।
मामला एक जौहरी परिवार से कथित वसूली का है। आरोप है कि रेलवे स्टेशन पर जांच के दौरान पुलिसकर्मियों ने एक व्यक्ति, उसकी नाबालिग बेटी और साले को रोककर तलाशी ली। तलाशी में सोने की बिस्किट और नकदी मिलने के बाद उन्हें एक अलग कमरे में ले जाया गया, जहां कथित तौर पर नकदी अपने पास रख ली गई। बाद में इस संबंध में एफआईआर दर्ज कराई गई।
सत्र अदालत ने पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज और शिकायत दर्ज कराने में देरी को आधार बनाकर उन्हें राहत दे दी। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि संबंधित पुलिसकर्मी शिकायतकर्ता को ऐसे स्थान पर ले गए थे जहां सीसीटीवी निगरानी नहीं थी। अदालत ने कहा कि उपलब्ध फुटेज में बातचीत भले सुनाई नहीं देती, लेकिन वहां मौजूद लोगों की गतिविधियां और हावभाव दबाव और तनाव की स्थिति की ओर संकेत करते हैं।
कोर्ट ने यह भी माना कि जिस समय शिकायतकर्ता और उसके परिजनों को बंद कमरे में रखा गया, वह कथित अपराध को अंजाम देने के लिए पर्याप्त था। साथ ही अदालत ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि बाद में सोना वापस कर दिए जाने से आरोप कमजोर पड़ जाते हैं। कोर्ट के अनुसार, यह परिस्थिति अभियोजन के आरोपों को और मजबूत करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बच्ची की मौजूदगी के बावजूद पुलिसकर्मियों द्वारा अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाए जाने पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि कानून लागू करने वाले अधिकारियों के लिए जवाबदेही और नैतिक मानक सामान्य नागरिकों की तुलना में कहीं अधिक ऊंचे होने चाहिए।
इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा दी गई अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल जमानत के प्रश्न तक सीमित हैं और मुकदमे के अंतिम फैसले को प्रभावित नहीं करेंगी।
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