ट्रंप की ट्रेड डील से बढ़ी चिंता, जॉब्स से लेकर सोना-चांदी तक—बजट 2026-27 में इन चुनौतियों से निपटना होगा सरकार को

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अमेरिका के साथ संभावित व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता आगामी केंद्रीय बजट 2026-27 के लिए एक बड़ी चुनौती बनती नजर आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत शुल्क पहले से लागू किया जा चुका है और भविष्य में और सख्त कदमों के संकेत भी दिए जा रहे हैं। ऐसे में जानकारों का मानना है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट में इस मुद्दे की अनदेखी नहीं कर सकतीं।

भारत का अमेरिका को सालाना करीब 90 अरब डॉलर का वस्तु निर्यात है, जिसमें गारमेंट, जेम्स एंड ज्वेलरी, लेदर और अन्य रोजगारपरक सेक्टर की बड़ी हिस्सेदारी है। विशेषज्ञों के मुताबिक यदि निर्यात पर दबाव बढ़ता है तो इसका सीधा असर रोजगार, मैन्यूफैक्चरिंग और आर्थिक विकास दर पर पड़ सकता है।

निर्यात पर असर, जॉब्स पर खतरा

अमेरिका में ऊंचे शुल्क के चलते भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा कमजोर हो रही है। जानकारों का कहना है कि इतने अधिक टैरिफ के साथ लंबे समय तक अमेरिकी बाजार में टिके रहना आसान नहीं होगा। इससे मैन्यूफैक्चरिंग गतिविधियां सुस्त पड़ सकती हैं और रोजगार सृजन की रफ्तार पर ब्रेक लग सकता है, जिसका असर विकास दर पर भी दिखेगा।

बजट में बढ़ सकता है पूंजीगत खर्च

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को बजट में पूंजीगत व्यय और इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च को और मजबूत करना होगा। चालू वित्त वर्ष में इस मद में 11.2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का प्रावधान किया गया है, और संभावना है कि आगामी बजट में यह आंकड़ा और बढ़ाया जाए।

हालांकि, एक चिंता यह भी है कि मौजूदा वित्त वर्ष की पूरी आवंटित राशि मार्च तक खर्च हो पाएगी या नहीं। रेलवे ने जहां अपने बजट का लगभग 80 प्रतिशत खर्च कर लिया है, वहीं कई अन्य विभागों की खर्च गति अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है।

PLI जैसी योजनाओं पर बढ़ेगा जोर

एचडीएफसी बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता के अनुसार, अमेरिका के साथ व्यापार अनिश्चितता को देखते हुए सरकार को पूंजीगत व्यय में तेजी बनाए रखने के साथ-साथ मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी योजनाओं का दायरा बढ़ाना चाहिए।

उनका कहना है कि फिलहाल अमेरिका में भारतीय निर्यात की स्थिति पूरी तरह खराब नहीं हुई है, लेकिन जिन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है—जैसे जेम्स एंड ज्वेलरी और लेदर—उनके निर्यातकों को नए बाजारों की तलाश करनी पड़ सकती है।

नए बाजार ढूंढना आसान नहीं

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस (FIEO) के पूर्व चेयरमैन शरद कुमार सराफ का कहना है कि कई निर्यातक अब अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की उम्मीद छोड़ चुके हैं और उसी हिसाब से रणनीति बना रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है और सैकड़ों भारतीय निर्यातक ऐसे हैं जो केवल उसी पर निर्भर हैं।

ऐसे निर्यातकों के लिए नए बाजार खोजना और वहां अपनी पकड़ बनाना समय लेने वाली प्रक्रिया होगी, और तब तक उनके कारोबार पर असर पड़ सकता है।

सोना-चांदी और निवेशकों की नजर

वैश्विक अनिश्चितता के बीच निवेशकों का रुझान सोना-चांदी जैसे सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़ सकता है। ऐसे में बजट में टैक्स स्ट्रक्चर, आयात शुल्क और निवेश से जुड़े प्रावधानों पर भी बाजार की खास नजर रहेगी।

कुल मिलाकर, बजट 2026-27 में सरकार के सामने चुनौती होगी कि वह ट्रेड दबाव, रोजगार सुरक्षा और आर्थिक विकास—तीनों के बीच संतुलन कैसे बनाए।

Kinni Times
Author: Kinni Times

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