उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव भले ही दूर हों, लेकिन कांग्रेस की नई रणनीतियों ने राज्य के सियासी समीकरणों को गरमा दिया है। कांग्रेस अब अपने पारंपरिक ‘मुस्लिम-ब्राह्मण-दलित’ वोट बैंक के भरोसे न रहकर सीधे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) वोट बैंक पर फोकस कर रही है। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या कांग्रेस का यह दांव सपा के जनाधार को प्रभावित करेगा।
रणनीति में बदलाव के 5 बड़े संकेत
राम मंदिर चंदा मुद्दा: CWC बैठक में कांग्रेस ने राम मंदिर चंदे में कथित अनियमितताओं को मुद्दा बनाकर देशव्यापी प्रदर्शन का फैसला किया, ताकि हिंदुत्व के मोर्चे पर भाजपा की घेराबंदी की जा सके।
OBC नेताओं की बैठकें: लखनऊ में OBC विभाग के पदाधिकारियों की बैठक कर पार्टी ने बूथ और जिला स्तर पर संगठन को सक्रिय करना शुरू कर दिया है।
राहुल गांधी का मंथन: राहुल गांधी ने OBC कांग्रेस जिला अध्यक्षों से सीधे संवाद में जातिगत जनगणना और ‘जितनी आबादी, उतना हक’ के नारे के साथ सड़कों पर उतरने की अपील की।
सोशल जस्टिस कॉन्फ्रेंस: कानपुर और झांसी से शुरू हो रही सम्मेलनों व पदयात्राओं की सीरीज के जरिए पार्टी गैर-यादव OBC और दलितों के बीच पैठ बना रही है।
जातिगत जनगणना का एजेंडा: जनगणना में OBC कॉलम की मांग को केंद्रीय मुद्दा बनाकर पार्टी पिछड़े वर्ग की आनुपातिक हिस्सेदारी का बड़ा दांव खेल रही है।
सपा और भाजपा दोनों के लिए चुनौती
यूपी में गैर-यादव OBC मतदाता सत्ता के बड़े निर्णायक माने जाते हैं। यदि कांग्रेस इस वर्ग में सेंध लगाती है तो भाजपा के कोर वोट बैंक के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के सामाजिक समीकरणों को भी भारी चुनौती मिल सकती है। हालांकि, मजबूत स्थानीय संगठन और सर्वमान्य OBC चेहरे की कमी फिलहाल कांग्रेस के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।








