नई दिल्ली के दक्षिणी इलाके असोला में स्थित शनि धाम क्षेत्र एक नए विवाद के केंद्र में आ गया है। यहां की करोड़ों रुपये की वन विभाग की सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा, रास्ता निर्माण, पेड़ों की अवैध कटाई और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए हैं।
शिकायतकर्ता, ने इस विषय में भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री दिल्ली सरकार, उपराज्यपाल, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को एक विस्तृत शिकायत पत्र भेजा है।
अवैध रास्ता और फार्महाउस से जोड़ने की साज़िश
शिकायत के अनुसार, असोला गांव के खसरा नंबर 1671, 1672, 1668, 1669, 1316, 1311, 1310 की वन विभागीय जमीन पर जबरन 30 फीट चौड़ा और लगभग 2000 फीट लंबा रास्ता बनाया गया है, जिसे फार्महाउस नंबर C-4 के पीछे स्थित खसरा नंबर 1673 से जोड़ा गया है।
इस रास्ते के निर्माण में स्थानीय प्रशासन, विशेषकर थाना मैदान गढ़ी, एसडीएम साकेत, और वन विभाग के अधिकारियों पर करोड़ों रुपये की रिश्वत लेकर भू-माफियाओं की मदद करने का आरोप लगाया गया है।
टेंट हाउस गोदाम, दीवार तोड़कर कब्जा और अवैध बोरिंग
शिकायत में कई और अवैध गतिविधियों की जानकारी दी गई है:
रास्ते के किनारे वन भूमि पर लोहे के स्ट्रक्चर लगाकर टेंट हाउस के गोदाम बनाए गए हैं।
वन विभाग की पुरानी दीवार तोड़कर लगभग 2 एकड़ जमीन पर कब्जा किया गया है।
रात के अंधेरे में दो अवैध ट्यूबवेल बोरिंग की गई हैं, जिनकी कोई सरकारी अनुमति नहीं है।
हरे-भरे पेड़ों की अवैध कटाई की गई है, जिसे गूगल मैप से भी ट्रेस किया जा सकता है।
ट्रैक्टर से जमीन को बिना अनुमति समतल किया जा रहा है।

चौकी होने के बावजूद अधिकारियों की मौन सहमति?
चौंकाने वाली बात यह है कि जहां यह सब हो रहा है, वहां वन विभाग की एक चौकी पहले से मौजूद है। वहां डिप्टी रेंजर, रेंजर ऑफिसर, और गार्ड तैनात हैं। फिर भी दिनदहाड़े सरकारी जमीन पर कब्जा, निर्माण और पेड़ों की कटाई की जा रही है — जिससे यह संदेह और गहरा होता है कि इन अधिकारियों की मौन सहमति या भागीदारी हो सकती है।
पुलिस ने शिकायत पर कार्रवाई नहीं की
दिनांक 02 सितंबर 2025 को पुलिस कंट्रोल रूम (112) पर भी शिकायत दर्ज की गई, लेकिन पुलिस प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया। यह लापरवाही प्रशासनिक मिलीभगत और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है।
शिकायतकर्ता की प्रमुख मांगें
शिकायतकर्ता ने संबंधित सभी उच्च अधिकारियों से निम्नलिखित मांगें की हैं:
वन भूमि की दोबारा नाप-तोल कराई जाए और अवैध निर्माण तुरंत हटाया जाए।
बनाए गए अवैध रास्ते को बंद किया जाए।
अवैध बोरिंग ट्यूबवेल को सील किया जाए और उनकी अनुमति की जांच हो।
काटे गए पेड़ों पर मुकदमा दर्ज किया जाए और बचे हुए पेड़ों की वीडियोग्राफी कर उन पर नंबर अंकित किए जाएं।
गूगल मैप की सहायता से टूटी दीवार और पेड़ों की कटाई की पुष्टि की जाए।
इस पूरे मामले में सीबीआई जांच करवाई जाए।
शामिल अधिकारियों के खिलाफ विजिलेंस जांच और निलंबन की कार्रवाई की जाए।
राजस्व रिकॉर्ड में इस रास्ते के कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए राजस्व विभाग से भी जांच कराई जाए।
दोषी अधिकारियों पर एंटी करप्शन एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया जाए।
प्रतिलिपि संबंधित विभागों को भेजी गई
शिकायत की प्रतिलिपि निम्नलिखित विभागों को भी भेजी गई है:
BSES राजधानी पावर लिमिटेड, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली
दिल्ली जल बोर्ड, करोल बाग, नई दिल्ली
निष्कर्ष: क्या वन भूमि सुरक्षित है?
इस मामले ने एक बार फिर दिल्ली की वन भूमि और पर्यावरण संरक्षण को लेकर सरकारी एजेंसियों की निष्क्रियता और भ्रष्टाचार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर पर्यावरण संरक्षण के लिए योजनाएं बनाई जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर वन विभाग और पुलिस की मिलीभगत से सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे किए जा रहे हैं।
अब देखना यह है कि क्या संबंधित अधिकारी इस गंभीर शिकायत पर तत्काल संज्ञान लेते हैं या फिर यह मामला भी अन्य अतिक्रमण मामलों की तरह फाइलों में दब कर रह जाएगा।


