देश के एनर्जी सेक्टर और ऑटोमोबाइल जगत में इन दिनों एथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल (पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण) को लेकर एक बेहद गंभीर बहस छिड़ गई है। अभी देश का एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग 20 फीसदी एथेनॉल वाले यानी E20 पेट्रोल के फायदों और उससे पुरानी गाड़ियों के माइलेज पर पड़ने वाले असर को समझने की कोशिश ही कर रहा था, कि सरकार और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की नजरें अब E25, E30 और यहां तक कि E85 जैसे अधिक एथेनॉल वाले ईंधनों पर टिक गई हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय और नीतिगत स्तर पर इस नए बदलाव को लेकर गहन मंथन शुरू हो चुका है, लेकिन इस बार सरकार जल्दबाजी के मूड में नहीं दिख रही है।
ट्रोल का सफर काफी तेजी से तय किया गया
हालिया रिपोर्टों और आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार देश भर में E25 फ्यूल को अचानक या अनिवार्य रूप से लागू करने के पक्ष में नहीं है। इसके बजाय, नीति-निर्माता इसे बहुत ही धीरे-धीरे, वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर और चरणबद्ध (Calibrated and Graded) तरीके से आगे बढ़ाने की रणनीति बना रहे हैं। दरअसल, इससे पहले देश में E10 से E20 पेट्रोल का सफर काफी तेजी से तय किया गया था, जिसके बाद से वाहन मालिकों और ऑटो कंपनियों की तरफ से कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने रखी गई थीं। इसी जमीनी हकीकत को देखते हुए सरकार अब फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।
एथेनॉल की प्रकृति हाइड्रोस्कोपिक होती
सरकार के इस सधे हुए रुख के पीछे सबसे बड़ा कारण देश की सड़कों पर दौड़ रहे करोड़ों पुराने वाहन और उनके मालिकों की बढ़ती चिंताएं हैं। ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि पुराने इंजनों की बनावट और सामग्री (मटेरियल) ज्यादा एथेनॉल वाले ईंधन को झेलने के लिए अनुकूल नहीं हैं। एथेनॉल की प्रकृति हाइड्रोस्कोपिक (नमी सोखने वाली) होती है, जिसके कारण अधिक मिश्रण होने पर पुराने इंजनों के रबर पार्ट्स, फ्यूल पाइप और टैंक में जंग (Corrosion) लगने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा, एथेनॉल का कैलोरीफिक मान (Calorific Value) पेट्रोल से कम होने के कारण गाड़ियों के माइलेज और परफॉर्मेंस पर भी इसका सीधा असर पड़ता है।








