अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बड़ी जीत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। चुनाव में डेमोक्रेट्स ने प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) और सीनेट, दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है। इससे आने वाले समय में ट्रंप के लिए अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा।
हालांकि, संसद के दोनों सदनों में बहुमत गंवाने का मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रपति के हाथ से सारी शक्तियां निकल गई हैं। अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को एक ऐसा अधिकार देता है, जिसके जरिए वह कांग्रेस से पास हुए किसी बिल को कानून बनने से रोक सकते हैं। इसे प्रेसिडेंशियल वीटो कहा जाता है।
ट्रंप भी संकेत दे चुके हैं कि वह डेमोक्रेट्स के एजेंडे का मुकाबला करने के लिए इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर राष्ट्रपति का वीटो पावर कैसे काम करता है और क्या डेमोक्रेट्स इसे बेअसर कर सकते हैं?
पहले समझिए राष्ट्रपति का वीटो पावर क्या है?
अमेरिकी संविधान के आर्टिकल-1, सेक्शन-7 के तहत राष्ट्रपति को कांग्रेस से पास होने वाले विधेयकों पर वीटो लगाने का अधिकार दिया गया है। जब प्रतिनिधि सभा और सीनेट किसी बिल को मंजूरी देकर राष्ट्रपति के पास भेजते हैं, तो राष्ट्रपति के पास उस पर फैसला लेने के लिए रविवार को छोड़कर 10 दिन का समय होता है।
इस दौरान राष्ट्रपति के पास तीन विकल्प होते हैं।
- बिल पर हस्ताक्षर: राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद बिल कानून बन जाता है।
- रेगुलर वीटो: राष्ट्रपति अपनी आपत्तियों के साथ बिल को वापस कांग्रेस के पास भेज सकते हैं। इसके बाद दोनों सदन दोबारा उस पर मतदान कर सकते हैं।
- बिना हस्ताक्षर के छोड़ना: अगर राष्ट्रपति 10 दिनों के भीतर बिल पर कोई कार्रवाई नहीं करते और कांग्रेस सत्र में बनी रहती है, तो बिल अपने आप कानून बन सकता है।
इस व्यवस्था का मकसद राष्ट्रपति और संसद के बीच शक्तियों का संतुलन बनाए रखना है।
ट्रंप के वीटो को रोकने के लिए कितने वोट चाहिए?
राष्ट्रपति अगर किसी बिल पर वीटो लगा देते हैं, तो कांग्रेस के पास उसे निरस्त करने का संवैधानिक अधिकार होता है। लेकिन इसके लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ती है।
अगर प्रतिनिधि सभा में सभी 435 सीटें और सीनेट में सभी 100 सीटें भरी हों, तो वीटो को निरस्त करने के लिए प्रतिनिधि सभा में 290 और सीनेट में 67 वोटों की जरूरत होगी।
यही वह चुनौती है जिसका सामना डेमोक्रेट्स को करना पड़ सकता है। दोनों सदनों में बहुमत हासिल करने के बावजूद उनके पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है। ऐसे में राष्ट्रपति के वीटो को पलटने के लिए उन्हें रिपब्लिकन सांसदों के समर्थन की भी जरूरत पड़ेगी।
इसका मतलब है कि डेमोक्रेट्स कई विधेयकों को आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन ट्रंप के विरोध की स्थिति में उन्हें कानून बनवाने के लिए अतिरिक्त राजनीतिक समर्थन जुटाना होगा।
क्या है पॉकेट वीटो, जिससे बिल हो सकता है खत्म?
रेगुलर वीटो के अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति के पास एक और संवैधानिक विकल्प होता है, जिसे पॉकेट वीटो कहा जाता है।
इस व्यवस्था में राष्ट्रपति किसी बिल पर हस्ताक्षर नहीं करते और उसे औपचारिक रूप से कांग्रेस को वापस भी नहीं भेजते। यदि राष्ट्रपति के पास बिल पहुंचने के 10 दिनों के भीतर कांग्रेस स्थगित हो जाती है और बिल वापस भेजना संभव नहीं रहता, तो वह विधेयक कानून नहीं बन पाता।
इसकी खास बात यह है कि पॉकेट वीटो को कांग्रेस दो-तिहाई बहुमत से भी निरस्त नहीं कर सकती। अगर सांसद उस प्रस्ताव को कानून बनाना चाहते हैं, तो उन्हें उसे दोबारा पेश करना होगा और पूरी विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा।
हालांकि, पॉकेट वीटो का इस्तेमाल हर संसदीय अवकाश के दौरान नहीं किया जा सकता। इसके लिए संविधान में तय शर्तों का पूरा होना जरूरी है।
चुनावी जीत के बाद भी ट्रंप के पास रहेंगी अहम शक्तियां
डेमोक्रेट्स की जीत से अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने जा रहा है। नई कांग्रेस के कार्यभार संभालने के बाद विपक्ष को विधेयकों, बजट और सरकारी कामकाज की निगरानी में अधिक भूमिका मिलेगी। वहीं, ट्रंप के पास राष्ट्रपति पद से जुड़ी कार्यकारी शक्तियां और वीटो का अधिकार बना रहेगा।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि चुनावी नतीजों के तुरंत बाद कांग्रेस का नियंत्रण नहीं बदलता। नई कांग्रेस के कार्यभार संभालने तक मौजूदा सदन की व्यवस्था जारी रहती है।
कुल मिलाकर, आने वाले दो साल अमेरिका की राजनीति में राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच टकराव के लिहाज से अहम हो सकते हैं। डेमोक्रेट्स के पास विधायी एजेंडे को प्रभावित करने की ताकत होगी, जबकि ट्रंप के पास वीटो के जरिए उनके कई प्रस्तावों को रोकने का विकल्प रहेगा।







