लेख पढ़ने से पहले अपने दिल को थोड़ा मज़बूत कर लीजिए… क्योंकि यह सिर्फ़ एक निबंध नहीं, हर पिता के त्याग की कहानी है।
एक स्कूल में बच्चों से विषय दिया गया— “मेरे पापा”।
अगले दिन जब कॉपियाँ जाँची गईं, तो एक बच्चे का निबंध पढ़कर पूरा स्टाफ भावुक हो गया। प्रिंसिपल ने उसके माता-पिता को स्कूल बुलाया और वह कॉपी उनके हाथों में थमा दी।
उस निबंध में लिखा था—
“मेरे पापा बहुत अजीब इंसान हैं… उनके दो हाथ हैं, लेकिन उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं खरीदा।
उनकी दो आँखें हैं, लेकिन मैंने उन्हें कई बार रात में चुपचाप रोते देखा है।
उनके पास एक पुरानी घड़ी है, जो हमेशा पाँच मिनट पीछे रहती है… शायद इसलिए क्योंकि मेरे पापा अपनी खुशियों से भी हमेशा पीछे रह जाते हैं।”
बच्चा आगे लिखता है—
“मेरे पापा कहते हैं कि मैं दुनिया का सबसे अमीर बेटा हूँ, लेकिन मुझे पता है कि उन्होंने कई सालों से अपने लिए नए जूते तक नहीं खरीदे।
महीने के आखिर में भी घर का राशन आ जाता है… मेरी स्कूल फीस भर जाती है… मेरी किताबें आ जाती हैं… लेकिन उनके हिस्से में कभी कुछ नहीं आता।”
एक दिन उसने पूछा—
“पापा, आप नया मोबाइल कब लोगे?”
पापा मुस्कुराकर बोले—
“जब मेरा बेटा बड़ा अफसर बन जाएगा।”
लेकिन बच्चे ने देखा था कि उनके मोबाइल की स्क्रीन पहले से टूटी हुई थी।
एक रात वह पानी पीने उठा तो देखा कि पापा बरामदे में बिजली का बिल हाथ में लिए बैठे हैं और उनकी आँखें नम हैं। बच्चे को देखते ही मुस्कुराकर बोले—
“मच्छर बहुत हैं, इसलिए बाहर बैठा हूँ।”
बच्चा समझ गया कि पापा झूठ बोल रहे हैं।
कुछ दिन बाद गलती से उसका हाथ लगा और पापा का चश्मा टूट गया। उसे लगा कि डाँट पड़ेगी, लेकिन पापा ने सिर्फ़ इतना कहा—
“कोई बात नहीं बेटा… पुराना ही तो था।”
अगले दिन वही टूटा चश्मा लगाए बिना वे काम पर चले गए।
बच्चे के जन्मदिन पर उन्होंने नई साइकिल दिला दी। उसी रात उसने माँ को कहते सुना—
“अपनी दवा फिर नहीं खरीदी?”
पापा हँसकर बोले—
“अरे… हल्का-सा दर्द ही तो है, ठीक हो जाएगा।”
तभी बच्चे को समझ आया कि उसकी साइकिल, पापा की दवाइयों से ज़्यादा ज़रूरी बन गई थी।
निबंध की आख़िरी पंक्तियाँ पढ़कर हर किसी की आँखें भर आईं—
“मैं बड़ा होकर डॉक्टर या अफसर नहीं बनना चाहता… सबसे पहले अपने पापा का बेटा बनना चाहता हूँ।
ताकि एक दिन उनसे कह सकूँ—
‘पापा… अब आपकी बारी है।
अब आप अपनी दवाई भी लेंगे, नया चश्मा भी बनवाएँगे, नए जूते भी पहनेंगे और पहली बार बिना खर्च गिने अपनी पसंद की मिठाई भी खाएँगे।’
अगर भगवान मुझे अगला जन्म दें, तो फिर से यही पापा देना… क्योंकि दुनिया का सबसे अमीर इंसान वही होता है, जिसके सिर पर पिता का हाथ होता है।”
निबंध पढ़ते-पढ़ते माँ की आँखों से आँसू बह निकले। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि उनके पति ने परिवार की हर खुशी के लिए अपनी कितनी इच्छाएँ, ज़रूरतें और सपने चुपचाप त्याग दिए।
उस दिन घर लौटते समय पत्नी ने अपने पति का हाथ थाम लिया और कहा—
“आज तक मैं यह गिनती करती रही कि तुमने मुझे क्या नहीं दिया… लेकिन कभी यह नहीं देखा कि तुमने अपने हिस्से का कितना कुछ छोड़ दिया।”
उस शाम वर्षों बाद पूरा परिवार एक साथ बैठा। शिकायतें नहीं थीं… सिर्फ़ अपनापन था।
पिता…
माँ घर का दिल होती हैं, लेकिन पिता वह मज़बूत दीवार होते हैं, जिनके सहारे पूरा परिवार खड़ा रहता है।
वे अपनी इच्छाओं को चुपचाप त्यागकर बच्चों के सपनों को उड़ान देते हैं। इसलिए जब तक पिता हमारे साथ हैं, उनके प्रेम, त्याग और संघर्ष का सम्मान कीजिए।
क्योंकि उनके जाने के बाद सबसे ज़्यादा उनकी वही खामोशी याद आती है, जिसे हम जीते-जी कभी समझ नहीं पाए।
🙏 सभी पिताओं को समर्पित।
यह भी पढे
आज का खास राशिफल https://kinnitimes.com/?p=31175








