देश की सर्वोच्च अदालत ने 12 साल तक अपने स्वाभिमान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ने वाले एक पत्रकार को बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने केरल के वरिष्ठ पत्रकार अरविंदन मणिकोठ को एक पुराने आपराधिक मामले में आत्मसमर्पण से छूट दे दी है।
यह मामला वर्ष 2013 का है, जब कासरगोड से प्रकाशित सांध्य दैनिक अखबार लेटेस्ट में प्रकाशित एक राजनीतिक व्यंग्य लेख को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। ‘माकपा ने हसीना को चूमा’ शीर्षक वाले इस लेख को तत्कालीन कन्हंगड नगरपालिका अध्यक्ष हसीना थजुद्दीन के खिलाफ आपत्तिजनक और अपमानजनक बताते हुए एफआईआर दर्ज की गई थी।
क्या था मामला
आरोप था कि लेख में इस्तेमाल की गई भाषा महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली है। पुलिस ने इस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 354A(1)(iv) के तहत मामला दर्ज किया। हालांकि, यह लेख राजनीतिक व्यंग्य के रूप में लिखा गया था, जिसमें नगरपालिका प्रशासन और सत्तारूढ़ दल पर कटाक्ष किया गया था।
निचली अदालत से हाईकोर्ट तक दोषसिद्धि
2019 में निचली अदालत ने अरविंदन मणिकोठ को दोषी ठहराते हुए अदालत के उठने तक कारावास और ₹50,000 मुआवजा देने की सजा सुनाई। इसके बाद सत्र न्यायालय और केरल हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। अगस्त 2025 में हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए कहा था कि लेख से शिकायतकर्ता की लज्जा भंग हुई है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने लेख नहीं लिखा था और बतौर प्रबंध संपादक केवल संपादकीय जिम्मेदारी निभाई थी। यह भी कहा गया कि राजनीतिक व्यंग्य को अश्लीलता मानना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट की राहत
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन यह मानते हुए कि पत्रकार पहले ही मुआवजा अदा कर चुके हैं और उन्हें केवल प्रतीकात्मक सजा दी गई थी, अदालत ने आत्मसमर्पण से छूट दे दी। यह आदेश न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी द्वारा पारित किया गया, जबकि बाद में न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की पीठ ने केरल सरकार को नोटिस जारी कर राहत जारी रखने का निर्देश दिया।
12 साल चली इस कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी और संपादकीय जिम्मेदारी को लेकर एक अहम संदेश माना जा रहा है।








