राजधानी दिल्ली के दक्षिणी क्षेत्र स्थित असोला गांव में विकास कार्यों को लेकर सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। यहां दिल्ली जल बोर्ड की लगभग ₹173 करोड़ की सीवर पाइपलाइन परियोजना और उससे जुड़ा सड़क निर्माण कार्य गंभीर विवादों में घिर गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि करोड़ों रुपये की परियोजना में गुणवत्ता से समझौता किया गया है, निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया गया है और विभागों के बीच समन्वय की कमी का खामियाजा आम जनता भुगत रही है।

एक महीने से अधूरी सड़क, लोगों का जीना हुआ मुश्किल
असोला गांव के रतन फुलवा मार्ग (ट्रांसफार्मर वाली गली) की स्थिति पिछले एक महीने से बेहद खराब बनी हुई है। सड़क खुदी हुई है और बरसात के बीच जगह-जगह बड़े गड्ढे बन चुके हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि आए दिन वाहन इन गड्ढों में फंस रहे हैं, कारों के टायर फट रहे हैं और दोपहिया वाहन चालक, बच्चे तथा बुजुर्ग दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद अब तक सड़क निर्माण का कार्य शुरू नहीं किया गया है, जिससे लोगों को रोजाना भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
सीवर परियोजना की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल
स्थानीय निवासियों का दावा है कि दिल्ली जल बोर्ड की ओर से भले ही पाइपलाइन बिछाने का कार्य पूरा होने की बात कही जा रही हो, लेकिन मौके की स्थिति कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
ग्रामीणों के आरोप हैं कि
पाइपलाइन में बिना ISI मार्क वाले निम्न गुणवत्ता के पाइप लगाए गए।
पाइपों के चारों ओर सुरक्षा के लिए आवश्यक RCC कंक्रीट एनकेसमेंट नहीं किया गया।
जेसीबी मशीन से खुदाई कर पाइपों को सीधे मिट्टी में दबा दिया गया।
कई स्थानों पर पाइपलाइन के जॉइंट अब भी अधूरे पड़े हैं।
यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो करोड़ों रुपये की इस परियोजना की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
दो विभाग, लेकिन जनता बीच में पिस रही
ग्रामीणों के अनुसार, सड़क निर्माण की जिम्मेदारी फ्लड कंट्रोल विभाग के पास है, जबकि सीवर लाइन का काम दिल्ली जल बोर्ड कर रहा है।
बताया जा रहा है कि फ्लड कंट्रोल विभाग का कहना है कि जब तक दिल्ली जल बोर्ड अपना कार्य पूरी तरह पूरा नहीं करेगा, तब तक सड़क निर्माण शुरू नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, स्थानीय लोगों का आरोप है कि दिल्ली जल बोर्ड अपना काम पूरा होने का दावा कर रहा है, जबकि जमीनी स्थिति अलग दिखाई दे रही है।
इन दोनों विभागों के बीच तालमेल की कमी का सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है।

जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी उठ रहे सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये की परियोजना होने के बावजूद क्षेत्र के जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और संबंधित अधिकारी पूरे मामले पर मौन हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि लगातार शिकायतों और खराब सड़क की वजह से हो रही दुर्घटनाओं के बावजूद न तो कोई प्रभावी निरीक्षण किया गया और न ही जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई होती दिखाई दे रही है।
फर्जी रनिंग बिल पास होने का भी आरोप
मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है। स्थानीय सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि फ्लड कंट्रोल विभाग के एक जूनियर इंजीनियर पर सड़क निर्माण कार्य पूरा हुए बिना ही कथित तौर पर रनिंग बिल पास कर ठेकेदार को भुगतान करने का आरोप है।
हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित विभाग की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
CBI जांच की मांग तेज
असोला गांव के निवासियों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि परियोजना में गुणवत्ता से समझौता किया गया है या बिना कार्य पूरा किए भुगतान किया गया है, तो इसकी जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी, जैसे CBI, से कराई जानी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके और यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो।
बड़े सवाल, जिनका जवाब जरूरी
₹173 करोड़ की परियोजना के बावजूद सड़क आज भी अधूरी क्यों है?
यदि काम पूरा हो चुका है तो सड़क निर्माण अब तक शुरू क्यों नहीं हुआ?
पाइपलाइन निर्माण में गुणवत्ता संबंधी आरोपों की जांच कौन करेगा?
क्या बिना पूरा कार्य हुए भुगतान किया गया?
आखिर जनता को कब तक बदहाल सड़कों और अधूरे विकास कार्यों का सामना करना पड़ेगा?
असोला गांव का यह मामला केवल एक सड़क या सीवर परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी परियोजनाओं की गुणवत्ता, जवाबदेही और विभागीय समन्वय पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोग अब केवल सड़क बनने का इंतजार नहीं कर रहे, बल्कि यह भी चाहते हैं कि करोड़ों रुपये की इस परियोजना की निष्पक्ष जांच हो और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता हुई है तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित पक्षों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।








