सुप्रीम कोर्ट ने सजा निलंबन और जमानत से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जब किसी आरोपी की सजा अपील के दौरान सस्पेंड हो चुकी हो और उसे जमानत मिल चुकी हो, तो उसे हर तारीख पर अपीलीय अदालत में पेश होने के लिए मजबूर करना गैरज़रूरी है।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने 19 जनवरी को कहा कि अपीलें अक्सर महीनों या वर्षों तक लंबित रहती हैं और कई बार सुनवाई टलती रहती है। ऐसे में हर तारीख पर आरोपी की मौजूदगी अनिवार्य करना उस पर बेवजह का बोझ डालने जैसा है। अदालत ने साफ कहा कि इससे न तो कोई उद्देश्य पूरा होता है और न ही यह उचित है।
यह टिप्पणी एक चेक बाउंस केस से जुड़े मामले में आई, जहां अपीलकर्ता को दोषी ठहराया गया था। अपील के दौरान उसकी सजा निलंबित कर जमानत दी गई थी, लेकिन बाद में अपीलीय अदालत ने जमानत रद्द कर गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया था।
उधर, मद्रास हाई कोर्ट ने सार्वजनिक सड़कों पर बने धार्मिक ढांचों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि सड़कों का कोई धार्मिक चरित्र नहीं होता और किसी भी धर्म से जुड़ा ढांचा अगर सार्वजनिक सड़क पर अतिक्रमण के रूप में बना है, तो उसे हटाया जाना चाहिए।
मद्रास हाई कोर्ट ने 22 जनवरी को ग्रेटर चेन्नै कॉरपोरेशन को निर्देश दिया कि सड़क पर बने एक ईसाई धार्मिक स्थल के खिलाफ कार्रवाई जल्द पूरी की जाए। कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु अर्बन लोकल बॉडीज एक्ट की धारा 128 के तहत ऐसे अतिक्रमणों को हटाना नगर निगम की कानूनी जिम्मेदारी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि चाहे ढांचा धार्मिक हो या गैर-धार्मिक, अगर वह सार्वजनिक स्थान पर अवैध रूप से बना है तो उसे हटाना आयुक्त की वैधानिक ड्यूटी है।








